Friday, 29 May 2020

जोधपुर रियासत का भारत में विलय UPDTAE

जोधपुर रियासत का भारत में विलय RAS / IAS

part 2 भारत में विलय RAS / IAS


जोधपुर रियासत  भारत की तीसरी सबसे बड़ी 36000 वर्ग किलोमीटर वाली रियासत जोधपुर तथा उसके आस-पास की रियासतें (जैसलमेर, बीकानेर) ऐसी रियासतें थी जो भौगोलिक रूप से पाकिस्तान से सीमा बनाती थी।  
जोधपुर राजा हनुमंत सिंह यह तय कर चुके थे कि वह विलय पत्र पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे तथा जैसलमेर व बीकानेर रियासतों को भी अपना साथ देने को कहा। 
जोधपुर राजा हनुवंत  सिंह ने मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना से मुलाकात की इस मुलाकात में वे अपने साथ जैसलमेर युवराज गिरधर सिंह को भी ले गए।  
 जिन्ना ने हनुमंत सिंह को हिंदुस्तान से ज्यादा रियायतें देने के लिए कहा और एक कोरे कागज पर हस्ताक्षर कर उसमें जो भी रियासत की शर्ते हैं उन्हें लिखने को कहा।

जोधपुर रियासत


हनुमंत सिंह ने अपनी शर्तें कुछ इस प्रकार रखी-

  •  कराची पोर्ट को इस्तेमाल करने जिससे जोधपुर रियासत का व्यापार ठप्प न हो
  • जोधपुर को सिंध के हैदराबाद तक जोड़ने वाली रेलवे लाइन पर जोधपुर का अधिकार हो
जैसलमेर रियासत के युवराज गिरधर सिंह ने भी अपनी रियासत को साथ में मिलने से पूर्व जिन्ना से एक सवाल पूछा कि यदि हिंदू मुस्लिम के बीच विवाद हुआ तो क्या जिन्ना  तटस्थ भूमिका रखेंगे? इस बीच जिन्ना के राजनीतिक सलाहकार मोहम्मद जफर उल्लाह ने ऐसी स्थिति नहीं आएगी कहकर बात को टाल दिया। 

जिन्ना हनुमंत सिंह को पाकिस्तान में विलय हेतु हस्ताक्षर करने के लिए दबाव बनाने लगे परंतु हनुमंत सिंह ने अपनी 36000 वर्ग किलोमीटर की रियासत, अपने जागीरदारों तथा राजमाता से सलाह लेने के लिए कुछ समय मांगा। परंतु जिन्ना ने आक्रोश आक्रोश जताते हुए स्वयं के हस्ताक्षर किया हुआ कोरा कागज वापस ले लिया। 

6 अगस्त 1947 को जन्मा वह हनुमंत सिंह की अंतिम बैठक हुई। 

10 अगस्त 1947 को हनुमंत सिंह की सरदार वल्लभभाई पटेल से मुलाकात हुई   पटेल ने भी हनुमंत सिंह को रियायत देने का वादा किया। 
 हनुमंत सिंह के पाकिस्तान से मिलने के लिए शर्त थी कि कराची पोर्ट पर उनका अधिकार हो इसका समाधान भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने जोधपुर को कच्छ के बंदरगाह से जोड़ते हुए निकाला जिससे जोधपुर के राजस्व में कोई कमी नहीं आएगी। 
 पटेल के समक्ष तो महाराजा हनुवंत सिंह सहमत हो गए परंतु 11 अगस्त 1947 को हनुवंत सिंह वायसराय भवन पहुंचे और वीपी मैनन से कुछ मतभेद होने पर मैंने उनके सिर  पर पेन पिस्तौल तान दी तथा हस्ताक्षर करने से मना कर दिया परंतु माउंटबेटन ने पेन पिस्तौल छीन ली।  
आखिरकार आजादी के महत्व 4 दिन पूर्व 11 अगस्त 1947 को महाराजा हनुवंत सिंह ने पर instrument of accession हस्ताक्षर किए।
फल स्वरूप जोधपुर जैसलमेर बीकानेर जैसी बड़ी रियासतें भारत में शामिल हो गई अन्यथा पूरा आधा राजस्थान आज पाकिस्तान में होता।




जूनागढ़ रियासत का भारत में विलय 

15 अगस्त 1947 को भारत की 565 रियासतों में से जूनागढ़ हैदराबाद व कश्मीर ऐसी रियासते थी जो अब तक आजाद थी इनमें से जूनागढ़ के नवाब मोहम्मद महाबत खान जी के पाकिस्तान में मिलने का फैसला 17 अगस्त 1947 को अखबारों की सुर्खियों में आ गया।
 जिन्ना ने नवाब को पाकिस्तान में मिलने की एवज में 8 करोड रुपए दिए ताकि पाकिस्तान बंदरगाहों को विकसित कर सकें तथा 25000 सैनिकों का ठिकाना तैयार कर सकें।

जूनागढ़ के पाकिस्तान में मिलने पर हिंदुस्तान के सामने समस्या खड़ी हो गई।  जिन्हें हल करना अत्यंत आवश्यक था।  इस पर कैबिनेट मीटिंग बुलाई गई इस मीटिंग में पटेल ने पाकिस्तान के विरुद्ध सख्ती बरतने तथा सैनिक कार्यवाही करने का प्रस्ताव रखा,परंतु माउंटबेटन सहमत नहीं हुए क्योंकि उनका मानना था कि पाकिस्तान जूनागढ़ को केवल एक मोहरा बना रहा है।  उसकी असली नजर कश्मीर पर है क्योंकि यदि भारत या कहता है कि जूनागढ़ का राजा मुस्लिम है परंतु वहां की अधिकांश जनता हिंदू है इस कारण उसे भारत में मिलना चाहिए तो उस पर पाकिस्तान पलटवार करता और कहता कि कश्मीर में भी राजा हिंदू है परंतु आवाम मुस्लिम है तो ऐसी स्थिति में तो कश्मीर को पाकिस्तान में होना चाहिए।

  इससे माउंटबेटन का मतलब साफ था कि यदि जूनागढ़ पर सैनिक कार्यवाही की गई तो इसकी कीमत भारत को कश्मीर में चुकानी पड़ेगी।  इस  पर पटेल माउंटबेटन से सहमत हो गए तथा जूनागढ़ पर सैनिक कार्यवाही टल गई परंतु मीटिंग मैं जूनागढ़ की सीमा पर चौकसी तथा नाकाबंदी बढ़ा देने का निर्णय हो गया तथा वीपी मेनन को जूनागढ़ भेजने का भी फैसला लिया गया ताकि जूनागढ़ की बगावत के पीछे किसका हाथ है? नवाब का या उनके दीवान शाहनवाज भुट्टो का.... इसे जाना जा सके।

19 सितंबर 1947 को मैनन नवाब से मुलाकात के लिए पहुंचे परंतु उनके दीवान शाहनवाज भुट्टो ने मिलने से रोक दिया।


 मेनन को जूनागढ़ में ज्यादा सफलता नहीं मिली परंतु दिल्ली लौटने से पूर्व उन्होंने जूनागढ़ की दो छोटी रियासतों मंगलौर व  बरियावाड़ को हिंदुस्तान में शामिल कर दिया। इसके विरोध में नवाब ने दोनों जागीरो में अपनी फौज भेज दी। जिससे दोनों जागीरदारों ने भारत में शामिल होने के फैसले को खारिज कर दिया । इसके बाद प्रधानमंत्री नेहरू के निर्णय के मुताबिक 24 सितंबर 1947 को जूनागढ़ की घेराबंदी शुरू हो गई।  परंतु बैटन ने सैनिक कार्यवाही से बचने तथा विवाद को UNO  में ले जाने को कहा परंतु पटेल ने बैटन की इस बात का विरोध करते हुए जूनागढ़ के विरोध नाकाबंदी को कायम रखा।
नवाब के सामने दो समस्याएं थी एक और हिंदुस्तान की फौज तथा दूसरी और नवाब के प्रति जनता का आक्रोश।  इस स्थिति में नवाब ने जूनागढ़ छोड़कर कराची भाग जाने का निर्णय लिया।
 अब  रियासत के प्रमुख शाहनवाज भुट्टो  थे उन्होंने पाकिस्तान से मदद की गुहार की का कोई जवाब नहीं आया तथा जिन्ना ने  कोई मदद भी नहीं की क्योंकि पाकिस्तान ने जूनागढ़ को तो केवल एक मोहरा बनाया  था।
 आखिरकार 7 नवंबर 1947 को शाहनवाज ने  जूनागढ़ को भारत में मिलाने का प्रस्ताव पेश किया और इस प्रकार जूनागढ़ को पाकिस्तान में शामिल होने से रोक दिया गया। 

part 3 भारत में विलय RAS / IAS

No comments:

Post a comment